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11 - वास्तु में ऐनर्जी का महत्व

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     वास्तु वास्तविक्ता पर आधारित एक शास्त्र है। जो वास्तव में है और जहां हम रहते ( वास )  करते हैं उसे ही हम 

वास्तुशास्त्र कहते हैं। आम लोगो की धारणा है कि हम वास्तु पर विश्वास नहीं करते, जो होना है हो कर ही रहेगा। और

 बहुतों का मानना है कि एक तो हम डूबे हुए है दूसरा खर्चा क्यों करें ? ज्यादातर वास्तु वाले तोड़- फोड़ ही करवांएगे। 

कहां से आयेगा पैसा तोड़- फोड का। बस, हम वास्तु पर विश्वास नहीं करते। कईयो ने तो वास्तु की किताबे पढ़ कर ही

 अपना मकान बनवा लिया है। फिर भी वह दुखी रहते है। सालो साल वक्त गुजरता जाता है परेशानी बढ़ती जाती है।

 धर में बिमारी आ जाती है, लड़ाई- झगड़े शुरू हो जाते हैं। बचा खुचा पैसा भी र्खच हो जाता है। कर्ज में डूब जाते है। 

कभी सोचा इस का कारण क्या है ? कारण है धर में वास्तु का दोष होना। भई, जब हमारा वक्त था तब ज्योतिषशास्त्र

 के मुताबिक ग्रह उच्च राशि में बैठा था तब हम ठाठ से खाते थे,पीते थे, दान भी करते थे, धर वही था। लेकिन वक्त

 बीतता गया। ग्रह बदले ,कोई नीच ग्रह कुंडली में आ गया तब सब कुछ बदल गया। वही धर जो कल तक र्स्वग लगता

 था आज नरक लगने लगा। क्यों ?? क्यों कि हम भाग्य पर विश्वास करते रहे। पहले तो अपनी कुंडली के भरोसे बैठते

 है काम न बना तो तंत्र मंत्र विद्या का सहारा लेते है। फिर भी काम न बना तो उस मकान को बेचने की कोशिश करते

 है। और अपने पुराने अच्छे दिनों को याद करते रहते है। गलती कहां हुई ? गलती है घर में वास्तुदोष का होना। ऐसे 

बहुत से प्रश्न है जिस का हल नहीं मिलता।

     मेरा मानना है वास्तुशास्त्र एक विज्ञान है। ज्यादातर लोगों को चार दिशाऐं ही मालूम है। वास्तव में 10 दिशाऐं

 होती है। पर हम वास्तुशास्त्र में 8 दिशाओं का प्रयोग करते है। हर दिशा का एक देवता होता है और हर दिशा में एक

 ग्रह का अधिपत्य होता है। उस का रंग रूप, बनावट आदि होती है। यह तो मित्थलाजिकल बातें हैं। न हम ने देवता 

को देखा और न ही उस का रूप। इस लिए हम विश्वास नहीं करते। क्योंकि हम भाग्य पर ज्यादा विश्वास करते हैं। अब

 प्रश्न यह है जो होना है हो कर रहेगा। ठीक है भाई, मरना तो एक दिन सब ने है, तो खाने से क्या फायदा, मर तो जाना

 ही है ? यह तो एक नकारात्मक सोच है। तीसरा प्रश्न तोड़ - फोड़़ क्यों ? कौन कहता है  तोड़ - फोड करो। मेरा मानना

 है कि उंगली में कोई घाव हो जांए तो इस का मतलब यह नहीं कि उंगली काट दो यह तो हल न हुआ। उसे ठीक किया

 जा सकता है। इसी प्रकार घर को भी एक बाडी समझो। घर में भी तोड़ फोड़ के बिना वास्तुदोष  को ठीक किया जा 

सकता है। वह भी बहुत कम पैसो में। वास्तु की किताबे पढ़ कर पुरा धर नहीं बनाया जा सकता। क्योकि ऐनर्जी की 

जानकारी का होना बहुत जरूरी हैं। जो किताबो में पूरी नहीं लिखी होती। 

        कभी हम ने सोचा कि आज जापान, अमेरिका, यूरोप जैसे देश हम से बहुत विकसित क्यों हैं। हम में से बहुतो का

 मानना है। कि हमारे ग्रंथो को पढ़ कर ही उन्होने तरक्की की है। क्या वहॉं भगवान को नहीं मानते ? क्या वह ग्रहों, 

उपग्रहों को नहीं मानते ? वह भी सब को मानते है पर अपने तर्क के आधार पर। सांईस को आधार मान कर मानते है। 

उनका मानना है कि हमें जीने के लिए दो मुख्य ऐनर्जी की जरूरत होती है। पहली जैविक ऐनर्जी, जो हमें उतर दिशा

 सें और दुसरी कास्मिक ऐनर्जी पूर्व दिशा से मिलती है। यानि उतर-पूर्व ईशान दिशा से हमें दोनो ऐनर्जी मिलती है। 

यह भगवान का द्वार है। यहां से हमे पाजटिव ऐनर्जी मिलती है। अगर हम उन के मुताबिक अगर हम ऐनर्जी मिटर 

से नापेगें तो हम पायेगें कि -

( र्नाथ )  उतर दिशा में  00 ऐनर्जी यानि नयूटरल ऐनर्जी मिलेगी।

( र्नाथ-वेस्ट ) उतर-पश्चिम में + 1  ऐनर्जी ,

( साउथ-वेस्ट) दक्षिण-पश्चिम में  + 2 - 15, 

( साउथ-ईस्ट ) दक्षिण-पूर्व में  + 1 -75 ऐनर्जी मिलेगी। जोकि यह हीट ऐनर्जी है।  

हमारे शास्त्रो के मुताबिक अगर हम ऐनर्जी मिटर से नापेगें तो हम पायेगें कि 

ईशान कोण में  00 ऐनर्जी

वायव्य कोण में  + 1 ऐनर्जी 

नैऋत्य कोण में  + 2 - 15 ऐनर्जी 

अग्नि कोण में  + 1 - 75 ऐनर्जी है मीटर बताएगा। जहॉं जो ऐनर्जी आती है और जो ऐनर्जी  उन को चाहिये वह वहॉं पर

 बनाना शुरू कर देते हैं। यानि उनके मुताबिक हीट ऐनर्जी  साउथ-ईस्ट, दक्षिण-पूर्व में, हमारे मुताबिक अग्नि कोण में

  + 1 - 75 हीट ऐनर्जी आयेगी। मतलब साफ है हमारे शास्त्र भी सही है उन की सांईस भी सही है। फर्क इतना है वह 

सांईस पर विश्वास करते है और हम बिना जानकारी के जहां दिल करा घर वही बनाना शुरू कर दिया यह भी न सोचा 

कि इस का क्या हर्ष होगा ? बस दिमाग में एक धारणा डाल दी कि भगवान तो चारो तरफ है। क्या र्फक पड़ता है। भाई

 हमारे शरीर में हाथ की जगह हाथ है। पांव की जगह पांव है। आंख की जगह ऑंख है, नाक की जगह नाक है। अगर 

इनका स्थान बदल दिया जाये तो क्या होगा ? इंसान बैठंगा लगेगा। इसी प्रकार धर को भी एक बाडी समझो, बैडरूम

 की जहॉं जगह है वही बनाइये, ऐसे ही टायलट, रसोइधर, बाथरूम की जगह होती है वही बनाइये। फिर देखिये धर में

 सुख ,शांति, ऐश्वर्य, मान, यश सब कुछ प्राप्त होगा। अब प्रश्न उठता है कि कुछ भी अपनी जगह पर ठीक नहीं है पता

 कैसे चलेगा ? हम ने पहले भी जिक्र किया है ऐनर्जी के असंतुलन से धर में क्रेश ऐनर्जी , डम्प ऐनर्जी , डैड ऐनर्जी , कैरी

 ऐनर्जी , नैगेटिव ऐनर्जी आदि आ जाती है और एक जियोपेथी स्ट्रेैस इक्टठा हो जाती है। जिस से धर में बीमारी, 

दरिद्रता, वंश न बढ़ना, आपस में मन मुटाव होना, बच्चों की शादी का न होना, अगर शादी हो भी गई तो तलाक की 

नौेबत आना आदि समस्यांए पैदा होती है। वास्तु में तोड़-फोड़ के बिना भी धर में सुख,शांती, समृद्वि, ऐश्वर्य प्राप्त किया

 जा सकता है। वास्तुदोष को दूर कर , ऐनर्जी संतुलित करके फिर से वही पुराने दिन ,वही खुशहाली ,वह भी बहुत कम

 पैसों में लाभ प्राप्त कर सकते हैं। अगर हम धर में कास्मिक और जैविक ऐनर्जी को बैलन्स कर दें तो सब ठीक हो 

सकता है। इस के लिए हम वास्तु में कई विद्याओं का प्रयोग करते है जैसे:- पायरा विद्या, हरबल विद्या , मिरर विद्या , 

मेटल विद्या, कलर विद्या, क्रिस्टल विद्या, यंत्र विद्या, अरोमा विद्या , मंत्र विद्या, फेंगशुई विद्या आदि से वास्तुदोष को दूर

 किया जा सकता है। एक वास्तु विशेषज्ञ को इन सब ऐनर्जी का और सब विद्याओं की जानकारी का होना बहुत जरूरी 

है। जरूरी नहीं कि यह सब विद्याएं एक ही समय एक ही धर में इस्तेमाल हो।

सुनील हिंगल: वास्तु विशेषज्ञ एंव ऐनर्जी स्कैनर

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