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2 - वास्तु का भवन निर्माण में योगदान

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 वास्तु द्वारा सुख-सम्पन्नता- प्रत्येक मनुष्य की यह मनोकामना होती है कि उसका ‘अपना घर’ हो। परन्तु प्रत्येक व्यक्ति

 का यह स्वप्न साकार नहीं हो पाता। इसका कारण निरंतर बढ़ती जनसंख्या को भी ठहराया जा सकता है। यदि किसी

 प्रकार परिश्रम द्वारा मनुष्य का ‘अपना घर’ वाला सपना पूरा भी हो जाए तो उसमें सुख-शांति के भोग की इच्छा अपूर्ण

 रह जाती है। क्योंकि उस घर में वास्तु सिद्धांतों का पालन नहीं किया जाता। यदि मनुष्य को ‘अपना घर’ तथा उसमें 

सुख-शांति भोग’- दोनों स्वप्न साकार करने हों तो वास्तु के सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए। वास्तुशास्त्र कोई 

ऐसा जादू नहीं करता कि धन का आगमन हो। यह तो ऐसी परिस्थितियां-भवन के कक्षों में सूर्य का प्रकाश, शुद्ध-ताजी

 वायु का आगमन, शयन कक्षों तथा देव स्थानों की उचित स्थिति आदि निर्मित करता है, जो अपना सुप्रभाव दिखाती

 है।

यदि परिस्थितियां इसके विपरित होंगी तो वे निश्चय ही कुप्रभाव दिखाएंगी। इससे रोग, शोक, निर्धनता आदि की 

स्थितियां उपजेंगी। वास्तुशास्त्र के अनुसार, सूर्य की ऊर्जावान और लौकिक किरणों तथा पृथ्वी पर उपलब्ध पवित्र जल का

 सामंजस्य ही पवित्रता का द्योतक है। यह पवित्रता जहां भी होती है, वहां का मानव धन-धान्य, सुख-सम्पत्ति,सौभाग्य एवं

 शांति प्राप्त करता है। इसका आशय है कि यदि भवन में (वह चाहे आवासीय हो, व्यावसायिक हो या अन्य प्रयोग का

 हो) वायु, जल और प्रकाश की उचित व्यवस्था हो तो वहां धनागमन, आर्थिक संपन्नता, निरोगता एवं सुख-शांति स्थायी

 रूप से रहेगी। अर्थात सभी प्रकार के कार्य प्रकृति के अनुरूप ही किये जाने चाहिए। किंतु यदि मनुष्य अहंकारवश स्वयं

 को ही कर्ता-धर्ता मान लेता है और प्रकृति के विरूद्ध कार्य करता है तो उसे भयानक आपदाओं, कष्टों तथा दुष्परिणामों

 का सामना करना पड़ता है। ऐसे में उसे कोई नहीं बचा सकता है। प्रकृति केसिद्धांत ही वास्तु शास्त्र के मूलाधार हैं। जो

 मनुष्य प्रकृति के इन मूलभूत सिद्धांतों का पालन नहीं करता अर्थात वह धनलक्ष्मी को प्रवेश का मार्ग नहीं देता, उसे

 जीवन पर्यन्त आर्थिक तंगी परेशान करती रहती है। 

यदि ब्रह्मांड में व्याप्त शक्तियों का हम पूरा-पूरा सदुपयोग करें तो धन-धान्य और सुख-शांति से परिपूर्ण जीवन यापन कर 

सकते हैं। विपरित स्थितियों में ये भी विपरित विपरित परिणाम देंगी। इस संबंध में ‘गरूण पुराण’ कहता है-सुख-दुख 

प्रदान करने वाला कोई दूसरा नहीं, हमारी स्वयं की बुद्धि है। यदि कुबुद्धि के प्रभाव में आकर हम प्रकृति के विरूद्ध 

आचरण करते हैं तो दुख और कष्ट भोगने पड़ते है। यह आचरण पंच महाभूतों के विपरीत होता है क्यांेकि हमारा जन्म 

पंच तत्वो से हुआ है।

    भवन निर्माण के दौरान दिशा विशेष में क्या बनाया जाए

ग्रह           दिशा          शुभ निर्माण

सूर्य           पूर्व           स्नानघर

चन्द्र          वायव्य         अतिथिगृह, अनाज भंडारगृह

मंगल         दक्षिण         रसोईघर, भंडारगृह

बुध           उत्तर           तिजोरी

गुरू           ईशान          पूजाघर, बैठक कक्ष

शुक्र           आग्नेय        रसोईघर

शनि          पश्चिम         अध्ययन कक्ष, बच्चों का शयन कक्ष

राहु           नैर्ऋत्य        वयस्कों का शयन कक्षर्

       अथात - उत्तर-पूर्व (ईशान) का स्वामी जल है; अतः कुआं, नलकूप, पानी की टंकी या अन्य जल स्त्रोत इसी 

दिशा में होना चाहिए।

दक्षिण-पूर्व (आग्नेय) का स्वामी अग्नि है; अतः अग्नि संबंधी कार्य-रसोईघर, फैक्ट्री, भट्ठी या बॉयलर इस दिशा में 

होना चाहिए। 

उतर-पश्चिम (वायव्य) दिशा का स्वामी वायु है; अतः इस दिशा में अतिथि गृह तथा फैक्ट्री में तैयार माल का भण्डार 

कक्ष बनाना चाहिए।

दक्षिण-पश्चिम (नैर्ऋत्य) दिशा का स्वामी पृथ्वी है। पृथ्वी सभी तत्वों में स्थिर है; अतः इस दिशा को अपने प्रयोग के

 लिए सुरक्षित   रखना चाहिए। केंद्र का स्वामी आकाश है; अतः इस भाग को गतिविधि     शून्य रखें या न्यूनतम 

गतिविधियां करें।

पाश्चात्य देशों में वास्तु विद्या का प्रयोग लगभग प्रत्येक निर्माण कार्य में होता है। यही कारण है कि वहां के लोग सुखी 

और समृद्ध हैं। चीन तथा कोरिया में यह विद्या ‘फेंग शुई’ के नाम से जानी जाती है। इस विद्या का चीन की सभ्यता में 

काफी समृद्धिशाली इतिहास रहा है। वास्तु शास्त्र कोई अन्धविश्वास नहीं है। इसका ठोस वैज्ञानिक आधार है। जिस प्रकार 

बिना खिड़की व रोशनदान वाला मकान रोग उत्पन्न करता है, उसी प्रकार वास्तुशास्त्र के प्रतिकूल बना मकान अनेक 

समस्याओं और कष्टों को जन्म देता।

सुनील हिंगल: वास्तु विशेषज्ञ एंव ऐनर्जी स्कैनर

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