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1 - वास्तुशास्त्र में हर दिशा का महत्व

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       चारों दिशाओं एवं चारों विदिशाओं का अपना-अपना प्रभाव होता है। उनके अलग-अलग विशेष कार्य हैं। इसी तथ्य

 को ध्यान में रखकर किसी भी प्रकार के वास्तु निर्माण के समय दिशा विशेष के प्रभावों से लाभ उठाना चाहिए।

     पूर्व - पूर्व दिशा ‘पितृ स्थान’ की सूचक है। ऐसा माना गया है कि पितरों की उपासना इसी दिशा की ओर मुंह

 करके की जानी चाहिए। इस दिशा के स्वामी इन्द्र हैं। पूर्व दिशा सूर्य की ओजस्वी किरणों का प्रवेश द्वार है। अतः वास्तु

 निर्माण में इस दिशा को सदैव खाली छोड़कर किरणों को स्वतंत्र रुप से प्रविष्ट होने का मार्ग दिया जाना चाहिए। पूर्व

 दिशा वंश-वृद्धि करने वाली है। हर प्रकार की वास्तु रचना में पूर्वी हिस्सा अवश्य खुला रहना चाहिए। इससे वंश स्वामी

 को दीर्घायु तथा पुत्र-पौत्रों की प्राप्ति होती है। 

     पश्चिम- ‘पश्चिम’ वह दिशा है, जहां सायंकाल सूर्यास्त होता है। ‘वरूण’ या ‘वायु’ को इस दिशा का अधिष्ठाता माना

 गया है। अतः यह दिशा वायु तत्व को प्रभावित करती है। पश्चिम दिशा को सुख एवं समृद्धिदायी कहा गया है। शास्त्रों में

 कहा गया है कि वायु चंचल और चलायमान है। अतः जिस घर का प्रवेश द्वार पश्चिम दिशा में होता है, उस घर के

 निवासी प्रसन्नचित तथा विनोदप्रिय होते हैं। पश्चिम दिशा में निवास करने वाला व्यक्ति जहां एकदम संपन्न नहीं रहता,

वहीं एकदम दरिद्र भी नहीं होता। लक्ष्मी की प्रवृत्ति चंचल है। पश्चिम दिशा भी चंचलता का द्योतक है, अतः यह माना

 गया है कि यहां  लक्ष्मी स्थायी रूप से नहीं रहती। पश्चिम दिशा भी अति शुभ प्रभाव वाली है। इसे यश, कीर्ति, 

सफलता एवं संपन्नता देने वाली माना गया है।

     उत्तर- प्रातःकाल सूर्य की ओर मुंह करके खड़े होने पर ठीक बाएं हाथ की ओर जो दिशा होती है, वह ‘उत्तर’ है।यह

 मातृ-भाव को व्यक्त करने वाली आंखें हैं। जल तत्व को इसी दिशा में स्थान मिलना चाहिए। उत्तरमुखी भवन में सदा

लक्ष्मी की कृपादृष्टि बनी रहती है, जो जीवन को धन-धान्य एवं सुख-सम्पति से भर देती है। उत्तर दिशा में लक्ष्मी का 

स्थिर होना इसलिए माना गया है क्योंकि ‘धु्रव तारा’ भी इसी दिशा में स्थिर है। भवन में सदैव उत्तर दिशा से प्रकाश के

 आगमन का स्थान रखना चाहिए। उत्तर दिशा पर कुबेर का आधिपत्य है। उत्तर दिशा में मातृ स्थान है। इसे सुख-

सम्पति एवं धन-धान्य देने वाली कहा गया है। उत्तर दिशा के प्रभाव से ननिहाल पक्ष लाभान्वित होता है।

     दक्षिण- ‘दक्षिण’ वह दिशा है, जो सूर्योदय के समय सूर्य की ओर मुंह करने पर दाएं हाथ की ओर हो। यह उत्तर 

दिशा के ठीक विपरीत होती है। दक्षिण दिशा में ‘पृथ्वी तत्व’ को व्याप्त माना गया है। ‘यम’ की स्वामित्व वाली इस 

दिशा को मुक्तिकारक कहा गया है। दक्षिणमुखी प्रवेश द्वार वाले भवन स्वामी की प्रकृति में धैर्य तथा स्थिरता का विशेष

 स्थान रहता है। इस दिशा के बारे में अनेक ग्रन्थों में कुछ शुभ और कुछ अशुभ लक्षणों की बातें कही गयी हैं। 

वास्तुशास्त्र ग्रन्थों में उल्लेख है कि दक्षिण दिशा सभी प्रकार की बुराइयों का नाश करके अच्छाइयों की ओर संकेत करती

 है।

     ईशान-‘ईशान’ एक विदिशा है अर्थात् दो दिशाओं (उत्तर-पूर्व) से निर्मित कोण है। यह चारों कोणों में सर्वाधिक

 पवित्र है। अतएव इसे आराधना, साधना, विद्यार्जन, लेखन एवं साहित्यिक गतिविधियों हेतु शुभ माना गया है। यह कोण

 मनुष्य को बुद्धि, ज्ञान, विवेक, धैर्य तथा साहस प्रदान करके सभी कष्टों से मुक्ति दिलाता है। इतने पूजनीय कोण को

 सदा पावन एवं स्वच्छ अवस्था में रखा जाना चाहिए। जिस भवन का यह कोण दूषित रहता है, उसकी आराधना विफल

 हो जाती है। उस घर में रहने वालों की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। परिवार में प्रायः कलह का वातावरण बना रहता है। यह

 भी कहा गया है कि ईशान कोण के दूषित होने से कन्या सन्तान की ही प्राप्ति होती है। यदि पुत्र उत्पन्न होता भी है

 तो वह अल्पायु या रोगी रहता है। ईशान एक पवित्र एवं दोष रहित कोण हैं अतः यहां स्वच्छ और सात्विक गतिविधियों

 का ही संचालन किया जाना चाहिए। वंश-वृद्धि भी इसी कोण के प्रभाव से संभव हो पाती है।

     आग्नेय- दक्षिण-पूर्व दिशाओं को मिलाने वाला कोण ‘आग्नेय’ कहलाता है। यह स्वास्थ्यप्रदाता है। इस विदिशा में

 ‘अग्नि तत्व’ को स्थिर माना गया है। इसका कारण है कि यह कोण पूर्व एवं दक्षिण के ठीक मध्य में स्थित है। यदि

 भवन के आग्नेय कोण में गंदगी या दूषित पदार्थों का अस्तित्व हो तो वहां के लोगों के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव

 पड़ता है। अतः आग्नेय कोण की समय-समय पर सफाई की जानी चाहिए। इस कोण में बिजली के उपकरणों तथा लोहे

 के सामानों को स्थान दिया जाना चाहिए। आग्नेय मिले-जुले प्रभावों वाली विदिशा है। यह कोण गरम होने से जहां

 गृहस्वामी को स्वास्थ्य प्रदान करता है, वहीं दोषपूर्ण होने से उसे अहंकारी एवं क्रोधी बना देता है।

     नैऋत्य- ‘नैऋत्य’ दक्षिण एवं पश्चिम दिशा को मिलाने वाला होता है। यह विदिशा शत्रुओं का नाश करती है।

 इसका स्वामी राक्षस है। कई बार इस दिशा के कारण मनुष्य असमय काल का ग्रास बन जाता है। यदि आवासीय भवन

 में नैऋत्य कोण को दूषित रखा जाय तो उसमें रहने वाले मनुष्यों का चरित्र दूषित होता है। तथा शत्रु पक्ष प्रबल होता

 है। इस विदिशा के प्रभाव से ही भवन पर भूत प्रेत आदि की छाया बनी रहती है। इन सभी दुष्प्रभावों के कारण मनुष्य

 आकस्मिक संकटों के जाल में फंसा रहता है। नैऋत्य का मूल अर्थ है- पुनः-पुनःहोना, चाहे वह कोई भी घटना हो। इस

 तरह नैऋत्य का अर्थ हुआ-उचित समय पर उचित बात या घटना का होना। नैऋत्य आसुरी शक्तियों का आश्रय स्थल

 है। अतः इस कोण में ‘पूर्वजों’ की तस्वीरें लगाई जानी चाहिए। ताकि पितृ प्रसन्न रहें।

     वायव्य- ‘वायव्य’ का तात्पर्य उस कोण से है, जो उत्तर और पश्चिम दिशा को मिलाता है। वायव्य कोण के प्रभाव

 अत्यंत शुभ फलदायी होते हैं। यह मनुष्य को दीर्घायु, स्वास्थ्य तथा शक्ति प्रदान करता है। इस विदिशा में हमेशा शुद्धता

 रहनी चाहिए। यदि यह किसी कारणवश दूषित हो जाए तो अपने विपरीत प्रभावों से भवन के निवासीयों को पीड़ा

 पहुंचाती है। ऐसे में मित्र भी शत्रुवत व्यवहार करने लगते हैं। शक्ति-सामर्थ्य का असमय ह्नास होता है। यह सब इस

 कारण होता है, क्योंकि घर का मुखिया अहंकारी हो जाता है। उसकी मति भ्रष्ट हो जाती है। वायव्य कोण का अधिष्ठाता

 वायु है। वायु के स्वामित्व वाले इस कोण को मित्रता अथवा शत्रुता का जन्म दाता माना गया हैं इस कोण के दोषपूर्ण

 रहने से शत्रुओं की तथा दोषरहित होने से मित्रों की संख्या बढ़ती है।

सुनील हिंगल: वास्तु विशेषज्ञ एंव ऐनर्जी स्कैनर

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