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वास्तु में मुख्य द्वार का ग्रहों से संबंध

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       वास्तु के अनुसार आठ दिशाएं होती हैं और प्रत्येक दिशा एक निश्चित ग्रह से प्रभावित होती है और हर दिशा में एक ग्रह का 

आधिपत्य होता है।

    सूर्य - यदि भवन का प्रवेश द्वार, मुख्य द्वार, पूर्व दिशा में हो तो इस भवन पर सूर्य का आधिपत्य होता है। तेजस्विता सूर्य का 

स्वभव है, अतः परिवार पर भी  इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। परिणाम स्वरूप धर के सभी लोग श्रेष्ठ व्यक्तित्व वाले, आजस्वी 

तथा समृद्ध रहते हैं। ऐसे भवन के स्वामी को कड़वी वस्तुएं- मेथी,करेला आदि अधिक भाती है।

    चन्द्र - यदि भवन का मुख्य द्वार वायव्य दिशा में हो तो इस भवन पर चन्द्र का स्वामित्व होता है। परिवार के मुखिया का स्वभाव

अति चंचल, अस्थिर तथा भावावेश में बहने वाला होता है। सैर - सपाटा और यात्रा उसे बेहद पसंद होती है। हरी सब्जियों का सेवन 

अच्छा लगता है। ऐसे लोग नमक अधिक खाते हैं।

    मंगल - मंगल उस भवन का स्वामी होता है, जिसका प्रवेश द्वार दक्षिण दिशा में रहता है। मंगल के प्रभाव से गृहस्वामी साहसी, 

चंचल तथा निडर हो जाता है। उसके पसंदीदा भोजन में मसालो एंव गरिष्ठ पदाथों की अधिकता रहती है।

    बुध - जिस भवन का प्रवेश द्वार उत्तर दिशा में होता है, उसका स्वामी बुध को माना गया है। बुध अपने प्रभाव द्वारा गृहस्वामी के 

व्यक्तित्व में बुद्धिचातुर्य एंव विनोद का समावेश करता है। ऐसा व्यक्ति अपने बुद्धि बल पर प्रसिद्धि पाता है। उसका कार्य क्षेत्र लेखन 

एंव साहित्य की अन्य विद्या होता है। वह नियमितता तथा अनुशासन का कड़ाई से पालन करता है। ऐसे मनुष्य किसी भी खाद्य 

सामग्री को प्रधानता नहीं देते। जो भी मिल जाता है, उसे स्वीकार कर लेते है।

    गुरू - गुरू या बृहस्पति अपना अधिपत्य उस भवन पर रखता है, जिसका प्रवेश द्वार ईशान दिशा में रहता है। ऐसा गृहस्वामी 

स्वभाव से दयालु, धार्मिक एंव विचारशील प्रकृति का होता है।  आवश्यकता पड़ने पर ये साहस का संचार भी कर लेते हैं। इनकी रूची

 अध्ययन, भाषा तथा शिक्षा के अन्य क्षेत्रो में होती है। ये प्राय पवित्र एंव सात्विक भोजन ही ग्रहण करते हैं।

    शुक्र - आग्नेय दिशा में प्रवेश द्वार होने से भवन पर शुक्र का आधिपत्य रहता है। इस कारण धर का मुखिया विलासी तथा मौज- 

मस्ती करने वाला होता है। ऐसे लोग जीवन के जटिल कार्यों के बीच भी मनोरंजन के लिए र्प्याप्त समय निकाल लेते हैं। ये अपनी 

आमदनीका एक बड़ा हिस्सा ऐसे ही कार्यो पर खर्च करते हैं। इनकी बातचीत सिनेमा, नाटक, संगीत, अभिनय पर ही केन्द्रित होती 

हैं। ये स्वभावतरू कला प्रेमी होते हैं। रसिक प्रवृति होने के कारण इनके कपड़े तड़क भड़क वाले होते हैं। सुंदर दिखने के लिए ये अनेक

 उपक्रम करते हैं। इनके भेजन में दही, पनीर, कढ़ी तथा खटटी वस्तुओं की अधिकता होती है।

    शनि - शनि उस भवन का स्वामी माना जाता है जिसका मुख्य द्वार पश्चिम दिशा में होता है। शनि के स्वभाव के परिणाम स्वरूप 

गृहस्वामी में ठहराव, गंभीरता एंव विचारशीलता आदि का समावेश हो जाता है। ऐसे लोग किसी भी कार्य में हाथ डालने से पूर्व 

गग्भीर चिंतन करते हैं। मिलने - जुलने वाले सभी सगे- संबंधियों में इनकी छवि गंभीर व्यक्तित्व वाली बन जाती है। ये ठंडे पेय 

पदार्थों तथा गरिष्ठ या तले भोजन को अधिक प्राथमिकता देते हैं।

     राहु - नैऋत्य दिशा में प्रवेश द्वार वाले भवन  पर राहु का स्वामित्व होता है। राहु को तामसी प्रवृति का माना गया है, अतएंव 

गृहस्वामी मूलतरू तामसिक अर्थात् धमंडी लुच्चा एंव धूर्त होता है। गुस्सा करना इनकी दिनचर्या का आवश्यक भाग बन जाता है। 

मांस तथा बासी वस्तुएं खाना इन्हें अच्छा लगता है।

     अब कई लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि यदि किसी भवन में एक से अधिक प्रवेश द्वार हों तो ग्रह किस प्रकार अपना असर

 दिखते हैं। इस प्रश्न का उत्तर यह है कि यदि उस धर पर दो या तीन ग्रहों का आधिपत्य हो तो सभी सम्मिश्रित प्रभाव गृहस्वामी पर 

पड़ते हैं।  प्रवेश द्वार के अतिरिक्त खिड़किया एंव रोशनदानो की स्थितियां भी अपना प्रभाव दिखाती हैं। वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तों एंव 

नियमों का पालन करके ग्रहों द्वारा वास्तु पर पड़ने वाले कुप्रभावों से बचा जा सकता है।

सुनील हिंगल: वास्तु विशेषज्ञ एंव ऐनर्जी स्कैनर

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