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3 - भवन निर्माण में वास्तुशास्त्र का योगदान

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प्रत्येक दिशा का अपना कार्य एवं महत्व है। नीचे एक सारणी दी जा रही है। इसके द्वारा यह आसानी से जाना जा सकता है कि किस
 दिशा में बोरिंग ,कुआं , जमीन के अंदर पानी की टंकि होने से क्या परिणाम होते हैं-

                दिशा                 परिणाम

                ईशान                समृद्धि एवं शांतिदायक

                पूर्व                  वैभव प्राप्ति

                नैर्ऋत्य               भवन स्वामी की रोग से मृत्यु

                पश्चिम               लक्ष्मी प्राप्ति

                आग्नेय               संतान का मंदबुद्वि पैदा होना या आक्समक मृत्यु

                दक्षिण                पत्नी को हडी संबंधी रोग

                वायव्य                शत्रु संख्या में वृद्धि

                उत्तर                 सुख प्राप्ति

         उपरोक्त सारिणी के विश्लेषण से यह ज्ञात होता है कि ईशान, पूर्व, उत्तर तथा पश्चिम दिशाएं सुख-समृद्धि एवं अन्य शुभ 

परिणामों की परिचायक हैं। जबकि अन्य दिशाओं में जल स्थान का होना अत्यंत अशुभ होता है।  यदि जल स्थान अनुचित दिशा में

 हो तो उसका समाधान किया जाना अति आवश्यक है। अन्यथा यह अपने कुप्रभावों द्वारा घर के स्वामी तथा अन्य सदस्यों को 

निरन्तर प्रताड़ित करता है। यदि भवन में जल स्थान गलत दिशा में हो तो उसके समाधान के लिए जल स्रोत को पूर्णतः खाली 

कराकर उसे पत्थर, मिट्टी एवं कंकरों आदि से भर दिया जाए। यह ध्यान रहे कि वह खोखला न हो या उसमें पानी बचा न रहे। 

अन्यथा यह अपने दुष्प्रभाव दिखाना प्रारम्भ कर सकता है। ‘वास्तुदोष निवारक यंत्रों’ के प्रयोग द्वारा भी इस दोष का निवारण संभव

 है।

 कुआं या अन्य जल स्रोत कभी भी घर के प्रमुख प्रवेश द्वार से सटाकर नहीं बनवाना चाहिए। ईशान कोण में जल स्थान की खुदाई 

दीवार से सटाकर न करें। वर्षा ऋतु के आने से पूर्व ही जल स्थान की खुदाई पूर्ण कर लें।

       चारों दिशाओं एवं चारों विदिशाओं का अपना-अपना प्रभाव होता है। उनके अलग-अलग विशेष कार्य हैं। इसी तथ्य को ध्यान में

 रखकर किसी भी प्रकार के वास्तु निर्माण के समय दिशा विशेष के प्रभावों से लाभ उठाना चाहिए। यह प्रभाव यहां प्रस्तुत किया जा 

रहा है-

        पूर्व दिशा का स्वामी इंद्र है। इस दिशा में विष्णु, सुर्य तथा इंद्र का निवास स्थान माना गया है। पूर्व दिशा वंश-वृद्धि करने वाली 

है। हर प्रकार की वास्तु रचना में पूर्वी हिस्सा अवश्य खुला रहना चाहिए। इससे वंश स्वामी को दीर्घायु तथा पुत्र-पौत्रों की प्राप्ति होती 

है। पूर्व दिशा में स्नानघर, स्वागत कक्ष या बैठक, तलघर या बेसमेंट, कुआं, जमीन के अंदर पानी की टंकि का निर्माण करना चाहिए।

       पश्चिम का स्वामी वरूण है। यह विश्वकर्मा, सागर एवं नदियों के साथ ही वरूण का भी निवास स्थान है। पश्चिम दिशा भी अति

 शुभ प्रभाव वाली है। इसे यश, कीर्ति, सफलता एवं संपन्नता देने वाली माना गया है। पश्चिम दिशा में भोजन करने का स्थान, 

अध्ययन कक्ष, बच्चों का षयन कक्ष का निर्माण करना चाहिए।

               उत्तर का स्वामी कुबेर है। विशाख, स्कन्द, सोम तथा कुबेर इसी दिशा में निवास करते हैं। उत्तर दिशा में मातृ स्थान है। 

इसे सुख-सम्पति एवं धन-धान्य देने वाली कहा गया है। उत्तर दिशा के प्रभाव से ननिहाल पक्ष लाभान्वित होता है। उत्तर दिशा में 

तिजोरी, वस्त्रघर ,कोषागार, कुआं, तलघर या बेसमेंट, जमीन के अंदर पानी की टंकि का निर्माण करना चाहिए।

                     दक्षिण का स्वामी यम है। इस दिशा में गणेश, मातृकाएं, भूत-प्रेत और यमराज निवास करते हैं। दक्षिण दिशा 

सामान्य प्रभाव वाली है। कई ग्रन्थों में इसके कुप्रभाव तो कई ग्रन्थों में सुप्रभाव वर्णित है। दक्षिण दिशा में शयन कक्ष, घृत-तेल 

भण्डार, अन्य वस्तु भण्डार का निर्माण करना चाहिए।

                   ईशान पर शंकर का स्वामित्व है। इस विदिशा में महेश, लक्ष्मी तथा अग्नि का निवास है। इसलिए पूजा-स्थल का 

निर्माण ईशान कोण में ही किया जाना चाहिए। ईशान न एक पवित्र एवं दोष रहित कोण हैं अतः  यहां स्वच्छ और सात्विक 

गतिविधियों का ही संचालन किया जाना चाहिए। वंश-वृद्धि भी इसी कोण के प्रभाव से संभव हो पाती है। ईशान कोण में पूजाघर, 

कुआं, चिकित्सा कक्ष, जमीन के अंदर पानी की टंकि का निर्माण करना चाहिए।

                   आग्नेय कोण का स्वामी वायु है। इस दिशा में सनत्कुमार, सावित्री और हनुमान का निवास है।  आग्नेय मिले-जुले 

प्रभावों वाली विदिशा है। यह कोण गरम होने से जहां गृहस्वामी को स्वास्थ्य प्रदान करता है, वहीं दोषपूर्ण होने से उसे अहंकारी एवं 

क्रोधी बना देता है। आग्नेय कोण में दधिमंथन घर ,घृत-तेल भण्डार, रसोईघर का निर्माण करना चाहिए।

        नैर्ऋत्य कोण का स्वामी राक्षस है। इस दिशा में भद्रकाली तथा पितृगण आदि निवास करते हैं।  नैऋत्य आसुरी शक्तियों का 

आश्रय स्थल है। अतः इस कोण में ‘पूर्वजों’ की तस्वीरें लगाई जानी चाहिए। ताकि पितृ प्रसन्न रहें। नैऋत्य कोण में शौचालय, 

सूतिका गृह/शस्त्रागार, वयस्कों का षयन कक्ष का निर्माण करना चाहिए।

        वायव्य का स्वामी शनि है। शनि और कात्यायनी का निवास स्थान इसी दिशा में होता है। वायु के स्वामित्व वाले इस कोण 

को मित्रता अथवा शत्रुता का जन्म दाता माना गया हैं इस कोण के दोषपूर्ण रहने से शत्रुओं की तथा दोषरहित होने से मित्रों की संख्या

 बढ़ती है।  वायव्य कोण में अतिथिगृह, पशुघर, एकांतवास कक्ष का निर्माण करना चाहिए।

          सुनील हिंगल: वास्तु विशेषज्ञ एंव ऐनर्जी स्कैनर

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