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4 - वास्तुशास्त्र में वीथी एक वास्तुदोष

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 वास्तु एवं वेध के फलाफल आचार्य वराह मिहिर ने आठ ‘वीथियों’, अठारह ‘वास्तु’ तथा ग्यारह ‘वेधों’ का उल्लेख किया है। सन
 
वीथियों, वास्तु एवं वेध के अनेक कारण हो सकते हैं। सामान्य भाषा में ‘वीथि’ का तात्पर्य ‘बाधा’ या ‘रूकावट’ होता है। वास्तु 
शास्त्र में ‘वीथि’ का अर्थ यद्यपि बाधा या रुकावट से मिलता-जुलता है, परंतु थोड़ा अलग है। वास्तु शास्त्र के विभिन्न ग्रन्थों में 
‘वीथि’ का अर्थ वास्तुदोष के रूप में लिया गया है। अतएव ऐसे भूखंड का चयन वास्तु रचना के लिए कभी नहीं किया जाना चाहिए
 
जो वीथि युक्त हो। वीथि निर्माण की कई संभावनाएं होती हैं। वेध- आठ वीथियों एवं अठारह वास्तु के अतिरिक्त भी कई तरह के
 वास्तुदोष भूमि में होते हैं जो प्रकृति या मानव द्वारा निर्मित हो सकते हैं। इन्हें ‘वेध’ कहा जाता है। आमतौर पर दृष्टिगोचर होने वाले
 वेधों में उल्लेखनीय हैं- चौराहा, ताल-तलैया (रुका पानी), नाली एवं खंभा आदि। कई वृक्षों का निवास स्थान के आसपास होना भी
 
वास्तुदोष का कारण बन जाता है। सामान्यः वेध ग्यारह प्रकार के होते हैं- देवालय वेध, वृक्ष वेध, स्थिति वेध, कोण वेध, दिशा वेध, 
पंक्ति वेध, न देखने योग्य वेध, चित्र वेध, ध्वज वेध, रूप परिवर्तन वेध और आकार वेध।  देवालय वेध- देवालय अर्थात् मंदिर
 
आदि शुभ, पवित्र एवं शांति के द्योतक हैं। परंतु घर के अत्यधिक निकट देवालय का होना ‘देवालय वेध’ माना गया हैै। इसका कारण
 यह है कि देवालय संसार के विरक्ति का प्रतीक है। अतएव देवालय के अधिक निकट भवन या कार्यालय आदि होने से वहां के सदस्यों
 की मनोवृति विरक्ति पूर्ण हो जाती है। इसलिए वास्तु शास्त्र में सुझाव दिया गया है कि किसी भी परिसर का निर्माण मंदिर आदि के
 
निकट नहीं किया जाना चाहिए। यदि मकान के समीप मंदिर होता है तो मंदिर में स्थित देवी-देवताओं के दोष-प्रत्यादोष भी मकान
 
में आ जाते हैं। धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि मंदिर से 100 फुट की परिधि में मल-मूत्र, धूम्रपान, किसी जीव-जन्तु की हत्या तथा
 दुर्व्यवहार भी नहीं करना चाहिए। यहंा तक कि किसी प्रकार की नशीली वस्तुओं का प्रयोग भी वर्जित है। मन में अश्लील बातों का
 आना भी एक तरह से वास्तुदोष हो जाता है। जो लोग ऐसा करते हैं, वे देवदोष के शिकार हो जाते हैं। हनुमानजी के मंदिर के पास
 
रहने वालों को शोक, दुख, मृत्यु एवं दरिद्रता का शिकार होना पड़ता है। हनुमानजी शनि के अंश हैं। इसलिए हनुमानजी के मंदिर के
 
पास रहने वाले लोग शनि के दोषों से त्रस्त हो जाते हैं। यदि मकान मंदिर के प्रवेश द्वार के बाजू में हो तो देवालय वेध नहीं होता।
       वृक्ष वेध- यद्यपि हरे-भरे तथा पर्यावरण के पोषक वृक्षों की महत्ता अवर्णनीय है, परंतु इनका गलत जगह लग जाना ‘वृक्ष वेध’ 
कहलाता है। किसी भी प्रकार के वृक्ष की छाया घर की छत पर नहीं पड़नी चाहिए-कम से कम मुख्य प्रवेशद्वार पर तो बिलकुल ही 
में वर्णित दिशाओं एवं कोणों में ही वृक्ष लगाने चाहिए। स्थिति वेध- कुछ भूखंडों में वेध नहीं होते, परंतु आसपास की वास्तु रचनाओं
 के कारण ये वेध उत्पन्न हो जाते हैं। यही ‘स्थिति वेध’ कहलाते हैं। उदारहण स्वरूप - कई बार बड़ी कॉलोनियों की प्लॉटिंग करते
 समय ऐसी स्थिती बन जाती है कि सड़क या गली आगे जाकर बंद हो जाती है। लेकिन ऐस स्थान पर भी भूखंड होता है। इस प्रकार
 
के जो भूखंड होते हैं, उनमें मार्ग के अंत वाला भूखंड ‘बंद या कैदी भूखंड’ कहलाता है। यह भूखंड रिहायशी या व्यावसायिक किसी भी
 दृष्टिकोण से शुभ एवं उपयोगी नहीं होता। अतः इसका त्याग कर देना चाहिए। कोण वेध- मकान के चारो कोने समकोण में होने
 चाहिए। यदि उनमें से एक कोना छोटा हो तो इसको ‘कोण वेध’ कहते हैं। कोण वेध युक्त मकान में रहने वाले व्यक्ति को मृत्युतुल्य
 पीड़ा तथा कष्ट झेलने पड़ते हैं। जो अन्त में जिन्दगी का नाश कर देते देते हैं। यदि कोई कोण 90 डिग्री से छोटा हो तो उस कोने में
 
अलमारी नहीं रखनी चाहिए। यदि मकान के तीन, पांच या अधिक कोने हों तो भी ‘कोण वेध’ होता है। ऐसे मकान में रहने वाले
 
मनुष्य को कई प्रकार की भयानक बीमारियां भी लग सकती हैं। अतः मकान या भूखंड में कोण वेध नहीं होना चाहिए। सभी कोणों में
 समानता रहने पर ही वह सुखद एवं लाभदायक होता है। दिशा वेध- मकान का निर्माण कभी भी अपनी मन मर्जी से नहीं करनी
 चाहिए। इससे गृहस्वामी के धन और वंश का विनाश होता है। उसमें मकान-मालिक की मृत्यु भी हो सकती है। यदि पुराने मकान
 को तोड़कर नया मकान बनवाना हो तो पहले मकान की दिशा भंग नहीं करनी चाहिए, अन्यथा ‘दिशा वेध’ उत्पन्न हो जाएगा।
 अन्य दिशा में मकान बनवाने पर घातक परिणाम होते हैं। अतएव पहले के वास्तु के अनुसार ही नया मकान बनवाना चाहिए। 
 
    पंक्ति वेध- यदि मकान के दो कमरे जुड़े हों और उसके सामने एक ही खंभा हो तो यह ‘पंक्ति वेध’ कहलाता है। इससे परिवार कि
 सदस्यों में शत्रुता बढ़ती है। मकान मालिक को पुत्र की हानि होती है। शारीरिक, मानसिक, आर्थिक एवं राजनैतिक-सभी तरह के 
कष्ट झेलने पड़ते हैं। इसलिए ठीक से सोचने समझने के बाद ही मकान का निर्माण करना चाहिए यही बात वास्तु की प्रकृति, स्वभाव
 तथा उसके कार्यक्षेत्र की ओर संकेत करती है।  न देखने योग्य वेध- यदि कोई मकान एकदम सूना-सूना, भयावह तथा 
अंधकारयुक्त हो तो उसे देखना भी नहीं चाहिए। ऐसे मकान को ‘न देखने योग्य वेध’ कहा जाता है। इस प्रकार के मकान में कई तरह
 की अनहोनी घटनाएं हो सकती हैं, जिनका समाधान करना मुश्किल हो जाता है। अतः ऐसे मकान में कभी नहीं रहना चाहिए।
  
    चित्र वेध- यदि मकान में सिंह, चीता, बाघ तथा तेंदुआ आदि जंगली जानवरों एवं पक्षियों के चित्र हों तो यह ‘चित्र वेध’ कहलाता
 है। ऐेसे क्रूर पशुओं के सींग आदि भी अपने आवास में नहीं रखनी चाहिए। यदि अपने घर में चित्र लगाने हों तो देवी-देवताओं,
 महापुरूषों या किसी सुन्दर दृश्य के चित्र दीवारों पर लगा सकते हैं। इससे परिवार के सभी सदस्यों को सुख-शांति मिलती है। 
     ध्वज वेध- यदि किसी मकान पर मंदिर या मंदिर के ध्वज की छाया पड़ती हो तो यह भी अत्यंत अशुभ है। अगर मंदिर का ध्वज
 
काफी ऊंचा हो तो सूर्योदय या सूर्यास्त के समय काफी दूर तक के मकानों पर उसकी छाया पड़ सकती है। यही ‘ध्वज वेध’ कहलाता
है।  शास्त्रों के अनुसार यदि मंदिर से 100 फुट की परिधि में मकान का निर्माण किया जाए तो उसमें रहने वाले सदस्य ध्वज वेध से 
पीड़ित हो सकते हैं। ऐसे लोग हृदय रोग, मंद बुद्धि, उन्माद, लकवा आदि रोगों तथा आजीविका संबंधी परेशानियों के शिकार हो जाते
 हैं। अतः इस ध्वज वेध से भी बचने का प्रयास करना चाहिए।  रूप परिवर्तन वेध- यदि घर का प्रवेश द्वार ईंट-पत्थरों से चुना 
जाए, वर्तमान प्रवेश द्वार बंद करके घर के सामने का हिस्सा तोड़कर आगे-पीछे किया जाए, पुराने मकान को तोड़कर पुनः बनवाया
 जाए या दरवाजे के बीच दीवार खड़ी करके दो हिस्से कर दिए जाएं तो यह ‘रूप परिवर्तन वेध’ कहलाता है। यह वेध भी अत्यधिक
 
अशुभ होता है। ऐसे मकान में रहने वाले व्यक्ति की मृत्यु तक हो सकती है। धननाश की भी आशंका सदैव बनी रहती है। आकार 
वेध- सूप या सीप के आकार का मकान वेध युक्त माना जाता है। यदि ऐसी जगह पर दुकानदारी करें तो आय सीमित रहती है। आय
में बढ़ोतरी का नामोनिशान नहीं होता। ऐसे में परिवार के आर्थिक व्यय तथा आय में संतुलन स्थापित करना भी मुश्किल हो जाता
 
है। ऐसे घर में शांति से रहना दुर्लभ हो जाता है। सुख-शांति कम हो जाती है। अतः शास्त्रों में वर्णित तथ्यों को ध्यान में रखकर ही 
मकान का निर्माण करना चाहिए। जिससे भावी जिन्दगी सफल बन सके। इस तरह मकानों का सही प्रतिरूप, आकार, संरचना तथा 
समय का ध्यान देना चाहिए। मनुष्य के भविष्य का निर्धारण दो दिशाएं करती हैं। जो उसके मुख्य प्रवेश द्वार से लेकर भवन के हर
 
कोने तक जुड़ी रहती हैं। दिशाओं से किसी व्यक्ति की संपन्नता या विपन्नता का पता आसानी से लगाया जा सकता है।
सुनील हिंगल: वास्तु विशेषज्ञ एंव ऐनर्जी स्कैनर
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