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जल स्रोतों की महत्ता

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जल को भारतीय संस्कृति में पवित्र एवं उच्च स्थान प्राप्त है। प्रत्येक शुभ कार्य जल से ही प्रारम्भ किया जाता है। जल की महत्ता
 इसलिए भी बढ़ जाती है, क्योंकि जल स्थानों के तट पर ही अनेक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल तथा मंदिर आदि अवस्थित हैं। हमारे
 चारों धाम-बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम् और जगन्नाथपुरी भी जल स्थानों पर स्थित है। जल और प्राचीन सभ्यताएं- हमारे
 प्राचीन ऋषि-मुनियों ने अपनी कठोर साधनाओं तथा तपस्याओं के लिए नदी-तालाब के तटों का ही चयन किया। विश्व की चारों
 महान प्राचीन मानव सभ्यताओं का उद्भव एवं विकास भी नदी घाटियों में ही हुआ है। जैसे- चीन की सभ्यता का विकास ह्नांग-हो
 नदी के किनारे, मिस्र की सभ्यता का विकास नील नदी के किनारे, मेसोपोटामिया की सभ्यता का विकास दजला-फरात नदियों के
 किनारे तथा सिन्धु घाटी सभ्यता का विकास सिंधु नदी के किनारे आदि।   जल परीक्षण- जल-स्थान या स्रोत की खुदाई कई
 उद्देश्यों को लेकर की जा सकती है। इस खुदाई से निर्माणकर्ता को कई तरह की आशा होती है। कई बार जल निकल भी आता है। तो
 वह भूमि स्वामी को रंग या स्वाद के आधार पर नापसंद होता है। इसलिए खुदाई का लम्बा और जटिल उपक्रम तभी प्रारम्भ करना
 चाहिए, जब स्थान विशेष पर निकलने वाले जल के मीठा एवं पवित्र होने की प्रबल संभावना हो। यदि पानी खरा निकले तो किसी
 भी शुभ उद्देश्य में उसका प्रयोग नहीं किया जा सकता। ऐसे कई परीक्षण एवं विधियां हैं, जिनके आधार पर जल के गुणों का भान
 किया जा सकता है। इनमें से कुछ का वर्णन यहां किया जा रहा है-  1- जिस धरा पर शीशम, सागवान, नीम, बेल आदि प्रजाति के
 वृक्ष सघनता में पाए जाते हैं, वहां पर खुदाई करने से मीठा जल मिलेगा। परंतु जल स्रोत की प्रवृत्ति ऐसी रहेगी कि सदैव एक ही
 मात्रा में जलापूर्ति नहीं होगी। अतः इस प्रकार की भूमि पर खुदाई करने से पूर्व इन बातों का ध्यान अवश्य रखें।   2- जिस भूमि की
 मिट्टी रेतीली, लाल रंग की, कसैली, पीली या भूरे रंग की हो, वहां यकीनन खरा पानी मिलेगा।  3- जिस धरा का रंग मटमैला या
 धूसर हो, वहां का जल मीठा होगा।  4- सर्वोत्तम प्रकार का मीठा जल देने वाली भूमि मूंज, कांस, कुश इत्यादि से मिश्रित; नीले वर्ण
 की, कोमल, बालू युक्त, काली अथवा लाल रंग की होती है। ऐसे भूमि में अवश्य ही स्वादिष्ट, मीठे एवं पवित्र जल का वास होता है।
5-  कबूतर, शहद, घी आदि के रंग वाली भूमि के नीचे पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध रहता है। अतः निश्ंिचत होकर ऐसी भूमि पर 
खुदाई की जानी चाहिए। 6- जल की पर्याप्तता का प्रमाण यह है कि वहां की जमीन पर पाए जाने पत्थरों का रंग लहसुनियां, मूंगा,
 बादल मेचक अथवा अधपके गूलर या कागज के समान कपिल वर्ण का होता है। 7- जिस भूमि का रंग अग्नि, सूर्य, भस्म अथवा ऊंट
 या गधे जैसा होता है, वहां पर पानी का नामो-निशान नहीं होता।  8- जिस भूमि पर उगने वाले वृक्ष दुन्धार या करील के हों। पेड़ों पर
 उगने वाले फूलों का रंग लाल हो तथा जमीन का रंग भी कुछ-कुछ लाला हो; वहां जल तो मिलेगा, परंतु बहुत गहराई पर। भूमिगत
 जल का पता लगाना-भूमिगत जल का पता लगाने के लिए कई तरह की विधियों का प्रयोग किया जाता है। इनमें से प्रमुख विधियों
 का वर्णन यहां प्रस्तुत है -  वांछित नक्षत्र, तिथि और वार को जोड़कर उसमें 4 से भाग करें। यदि 1 शेष बचे तो जल पाताल में है।
 अगर 2 शेष बचे तो जल स्थान में जल है। और 0 शेष बचे तो जल भूखंड में है। लेकिन यदि 3 शेष बचे तो कुछ मीटर की गहराई पर
 ही जल मिल जाएगा। इनका तात्पर्य यह है- यदि पाताल में जल हो तो बहुत परिश्रम से मिलता है। यदि जल स्थान में जल हो तो
 साधारण गहराई पर जल मिल जाता है। यदि भूमि में जल हो तो आसानी से प्राप्त हो जाता है।  बाएं हाथ की ऊंगलियों को इकट्ठा
 कीजिए। फिर एक नारियल की जटा निकालकर उस पर इस प्रकार रखिए कि उसकी चाटी मध्यमा ऊंगली की तरफ हो। इसी स्थिति
 में पूरे भूखंड पर चक्कर लगाएं। जिस जगह पर नारियल की चोटी खड़ी हो जाए, वहां ठहर जाएं। उस स्थान पर खुदाई करने से जल
अवश्य ही प्राप्त होगा। यहां इस बात का विशेष ध्यान रखें कि चलते समय हथेली पर रखे नारियल का पृष्ठभाग बिल्कुल न हिले। 
5- 6 इंच लम्बी बबूल की एक टहनी लेकर उसे ठीक मध्य भाग से चीर डालें। अब उन्हें ऊंगलियों में दबाकर भूमि का चक्कर लगााएं।
 जिस स्थान पर टहनी के दोनों सिरे आपस में मिलने लगें, वहां जल अवश्य ही प्राप्त होगा। निम्नवत् चित्र में दर्शाई गई आकृति के
 अनुसार एक तांबे के तार को आकार दें। फिर पतंग उड़ाते समय जैसे दोनों हाथों के अंगूठे और बाकी चार ऊंगलियों के बीच में पतंग
 के डोर की ‘चरखी’ रखी जाती है, उसी तरह इस तांबे का तार रखें। छोर ‘ए’ और ‘बी’ को दोनों हाथों के अंगूठे तथा पहली ऊंगली के
 बीच रखें। शेष भाग वजन के कारण जमीन के तरफ होगा। इस तार के साथ पूरे भूखंड में चक्कर लगाएं। जहां जमीन में पानी होगा,
 वहां यह तार चरखी की तरह गोल-गोल घूमने लगेगा। उस जगह निश्चित रूप से पानी मिलेगा। जल शोघन प्राचीन काल में
 भूमिगत जल के परीक्षण एवं स्वच्छता के लिए एक विधि प्रचलित थी। इस संदर्भ में वराह मिहिर ने अपने ग्रन्थ ‘बृहत्संहिता’ में
 लिखा है कि अंजन मोथा, खसखस, राजकोशतक, आंवला तथा कटहल का फल-इन सबको एक-एक सेर की मात्रा में लें। इन्हें सुखा-
पीसकर उस कुंए या अन्य भूमिगत जल स्रोत में डाल दें। जहां का जल खारा हो। इस क्रिया से जल शुद्ध, पवित्र एवं मीठा हो जाएगा।
सुनील हिंगल: वास्तु विशेषज्ञ एंव ऐनर्जी स्कैनर
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