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वास्तुशास्त्र में शयनकक्ष का महत्व

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       वास्तु वास्तविक्ता पर आधारित एक शास्त्र है। जो वास्तव में है और जहां हम रहते (वास) करते हैं उसे ही हम

 वास्तुशास्त्र कहते हैं। चारों दिशाओं एवं चारों विदिशाओं का अपना-अपना प्रभाव होता है। उनके अलग-अलग विशेष कार्य

 हैं। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर किसी भी प्रकार के वास्तु निर्माण के समय दिशा विशेष के प्रभावों से लाभ उठाना

 चाहिए। वास्तुशास्त्र में हम आठ दिशाओं का प्रयोग करते हैं।

 विभिन्न क्षेत्रों में स्थित शयनकक्षों के शुभाशुभ प्रभाव

1. ईशान (उत्तर-पूर्व)- पति-पत्नी के लिए उत्तर-पूर्व का शयनकक्ष शुभ नहीं होता। यहाँ सोने वाले विचलित हो सकते हैं

 और पुरूषों की कामेच्छा नहीं रह जाती तथा परिवार को आर्थिक एवं सामाजिक संकटों का सामना करना पड़ता है।

 2. पूर्व- शयनकक्ष हेतु पूर्व की स्थिति अच्छी नहीं मानी जाती। इससे पुरूष रोगग्रस्त होते हैं और धन की हानि होती है।

 इसके प्रभाव से लड़कियाँ पैदा होती हैं, किन्तु बच्चों का शयनकक्ष इस दिशा में बनाया जा सकता है।

 3. आग्नेय (दक्षिण-पूर्व)- इस दिशा में शयनकक्ष होने से स्वास्थ्य खराब होता है और अदालती कार्यवाही में उलझन

 पड़ती है। बांझपन की स्थिति बनती है या विकलांग अथवा घमण्डी बच्चे जन्म लेते हैं। स्त्रियों को उदर संबंधी समस्याएँ

 होती हैं, पुरूष तनावयुक्त रहते हैं और लड़कियों को भी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न होती हैं तथा पति-पत्नी में निरन्तर

 झगड़े होने लगते हैं, इस प्रकार आग्नेय में शयनकक्ष होने पर पूरे परिवार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, अतः इस

 स्थिति से बचना ही उचित होगा।

 4. दक्षिण- इस दिशा में शयनकक्ष होना शुभ है। यहाँ शयन करने वालों को विश्राम और शांति मिलती है। घर के लोगों

 में स्थिरता भी आती है। गृहस्वामी के बाद दूसरे वरिष्ठ सदस्य के लिए यह आदर्श दिशा है।

5. नैर्ऋतय (दक्षिण-पश्चिम)- शयन-कक्ष के लिए नैर्ऋत्य कोण सर्वश्रेष्ठ स्थिति है, विशेष रूप से गृह-स्वामी के लिए। यह

 धन-धान्य, स्वास्थ्य और समृद्धि देता है व वंश वृद्धि करता है। परिवार में जो व्यक्ति महत्वपूर्ण निर्णय लेता है, परिवार

 की समस्त जिम्मेदारियों का निर्वाह करता है, उसके लिए यह शयनकक्ष आदर्श है। यहाँ सोने वाले को मानसिक सुदृढ़ता

 भी प्राप्त होती है।

6. पश्चिम- पश्चिम दिशा का शयनकक्ष कल्याणकारी होता है। शयन करने वालों को खुशी तथा सुविधापूर्ण जीवन की प्राप्ति

 होती है। अतः वयस्कों के लिए इस दिशा का शयनकक्ष आदर्श स्थिति है।

7. वायव्य (उत्तर-पश्चिम)- यह चंचलता का कोण है। यदि गृहस्वामी अधिकतर घर से बाहर रहता है, तो इस दिशा में

 शयनकक्ष किया जा सकता है। अतिथियों एवं कन्याओं के लिए वायव्य कोण का शयनकक्ष आदर्श है। वास्तु के अनुसार

 यह दिशा वायु की है। अतः यहाँ निरन्तर ऊर्जा प्रवाह बना रहता है। यहाँ शयनकक्ष होने से मेहमान अधिक समय तक

 नहीं रूकेंगे तथा इसी प्रकार यहाँ पर रहने वाली लड़कियांे के विवाह जल्दी हो जायेंगे और उनके विवाह की समस्याएँ 

पैदा नहीं होगी।

 8. उत्तर- उत्तर दिशा शयनकक्ष के लिए उपयुक्त नहीं है, यहाँ शयन करने से बैचेनी हो सकती है। बच्चों के लिए इस दिशा

 का शयनकक्ष ठीक रहता है। अन्यों के लिए उचित नहीं है।

                                                सोते समय सिर की स्थिति

          वास्तु के अनुसार सिर सदा पूर्व या दक्षिण की तरफ करके सोना चाहिए। उत्तर या पश्चिम की तरफ सिर

 करके सोने से आयु क्षीण होती है तथा शरीर मे रोग उत्पन्न होते हैं। पूर्व की तरफ सिर करके सोने से विद्या की प्राप्ति

 होती है, दक्षिण की तरफ सिर करके सोने से धन व आयु की वृद्धि होती है। पश्चिम की तरफ सिर करके सोने से प्रबल

 चिंता होती है और उत्तर की तरफ सिर करके सोने से आयु क्षीण होती है अर्थात् मृत्यु होती है।

         आधुनिक जगत में लोग वास्तुदोषों के निवारण के बारे में नहीं सोचते। उन्हें लगता है कि वास्तुदोष निवारण

 के लिए कहीं अधिक तोड़-फोड़ न करनी पडंे मगर बड़े दुख के साथ यह कहना पड़ता है कि हमारे प्राचीन साहित्यों के

 इतने समृद्ध होते हुए भी आज का मानव इन वास्तु सिद्धांतों का लाभ नही उठा पा रहा है। वह व्यर्थ में ही रोगों,

आपदाओं, परेशानियों और कष्टों से घिरा रहता है। पाश्चात्य देशों में वास्तु विद्या का प्रयोग लगभग प्रत्येक निर्माण कार्य 

में होता है। यही कारण है कि वहां के लोग सुखी और समृद्ध हैं। चीन तथा कोरिया में यह विद्या ‘फेंग शुई’ के नाम से 

जानी जाती है। इस विद्या का चीन की सभ्यता में काफी समृद्धिशाली इतिहास रहा है। वास्तुशास्त्र कोई अन्धविश्वास नहीं

 है। इसका ठोस वैज्ञानिक आधार है।

सुनील हिंगल: वास्तु विशेषज्ञ एंव ऐनर्जी स्कैनर

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