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वास्तुशास्त्र में रसोईघर का महत्व

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  वास्तुशास्त्र में आवासीय भवनों में सर्वाधिक महत्व रसोई-कक्ष (पाकशाला) को दिया जाता है। चीन में रसोईघर को घर

 का खजाना (कोष) माना जाता है। घर का यही वह स्थान है, जो अग्नि से सम्बन्धित है। शास्त्रों में अग्नि की दिशा

 दक्षिण-पूर्व (आग्नेय) निधार्रित की गई है। अतः गृह-निर्माण में ताप, अग्नि एवं विद्युत उपकरणों आदि के लिए अग्नि

 कोण उपयुक्त माना गया है।वास्तुशास्त्र के अनुसार व्यक्ति का संतुलित स्वास्थ्य बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है 

कि घर में रसोई कक्ष की स्थिति कैसी है, वह किस दिशा में है और किस दिशा में मुख करके भोजन बनाया जाता है।

 व्यक्ति का स्वास्थ्य एवं धन-सम्पदा दोनो को रसोईघर प्रभावित करता है। अतः घर का यह सबसे महत्वपूर्ण अंग है,

क्योंकि इसमें बने या पकाये गये भोजन को खाकर ही व्यक्ति बाहरी जगत में जाकर कर्म-क्षेत्र में उतरकर दक्षता-पूर्वक 

कार्य करते हुए सफलता अर्जित करता है। मुख्य रूप से रसोईघर के लिए भवन का अग्नि कोण ही काम में लेना चाहिए।

 यदि किसी कारणवश इस दिशा में नहीं बनाया जा सकता, तो रसोई कक्ष को भवन के वायव्य कोण में बनाया जा

 सकता है, बशर्ते इस कक्ष के अग्नि कोण में ही चूल्हा, गैस या स्टोव रखे जायें। वास्तु नियमों के अनुसार गैस, चूल्हे

 का प्लेट फार्म अग्नि कोण में पूर्वी दीवार के सहारे एवं वायव्य कोण में रसोईघर है तो भी उस कक्ष के अग्नि कोण में

 पूर्वी दीवार के सहारे बनाना सर्वाधिक उपयुक्त है। प्लेट फार्म ‘एल’ आकार में पूर्वी एवं दक्षिण की दीवार के सहारे बनाना

 चाहिए, जिसमें दक्षिणी दीवार के पास रसोई का अन्य सामान रखने के काम मे ले तथा पूर्वी दीवार के पास चूल्हा, 

स्टोव रखें। इससे बनाने वाली का मुख पूर्व दिशा मे होगा जो कि वास्तुअनुसार सहीं है।

 दिशानुसार रसोईघर का प्रभाव

1. ईशान- भवन के ईशान कोण मे रसोई कक्ष का होना अत्यन्त अशुभ है। क्योंकि इससे वंश वृद्धि रूक जाती है, धन की

 हानि, कम लड़के होना, अत्यधिक खर्चे, मानसिक तनाव और निर्धनता की सूचक है। घर की महिलाओं की खाना बनाने

 मे रूचि नहीं होगी तथा परिवार के सदस्यों का स्वास्थ्य बिगड़ता जाता है।

 2. पूर्व- पूर्व की ओर रसोई होना भी अनुचित है। इससे भी नुकसान होते हैं। वंश परम्परा का रूक जाना, व्यवहार रूखा 

होना एवं सभी सदस्यों की नीयत खराब होती है।

 3. आग्नेय-दक्षिण- पूर्व (आग्नेय) कोण में रसोई या भट्ठी बहुत उत्तम मानी गई है। इस रसोई में बना खाना सभी को

 संतुष्ट करता है तथा सभी लोग स्वस्थ्य रहते हैं। स्वास्थ्य तथा समृद्धि प्राप्त होती है, लेकिन स्टोर रूम इस कोण में

 कदापि न बनवायें।

4. दक्षिण- इस दिशा में रसोई रखने से गरीबी, बैचेनी और मानसिक तनाव बने रहेंगे।

5. नैर्ऋत्य- दक्षिण-पश्चिम (नैर्ऋत्य) कोण में रसोई कक्ष होने से शारीरिक और मानसिक रोग पैदा होते हैं। गृह कलेष, 

परेशानियां, दुर्धटना का भय बना रहता है। लापरवाहीवश विषाक्त भोजन बन सकता है।

 6. पश्चिम- इस दिशा में रसोई कक्ष होगा तो परिवार के सदस्यों में आए-दिन कलह होगी। गृह-क्लेश के साथ तलाक तक

 की मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है।

7. वायव्य- उत्तर-पश्चिम (वायव्य) कोण रसोई के लिए द्वितीय श्रेष्ठ विकल्प है। अगर वायव्य दिशा में रसोईघर बना हो तो

 घर की बहुंए एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाती पाई जांएगी ओर घर की शांति भंग हो जाएगी। इसलिए 

वास्तुअनुसार ही रसोईघर को बनाये।

8. उत्तर- यह दिशा रसोई घर के लिए अत्यन्त अशुभ है। यहाँ का रसोईघर विवाद एवं सदाबहार गरीबी का प्रतीक है। 

रसोईघर अगर उत्तरदिशा में होगी तो समझिये कि आप कुबेर को जला रहे हैं क्योंकि रसोई में अग्नि तत्व प्रघान होता

 है। इससे घर में जैविक ऐनर्जी का असंतुलन पैदा हो जाता है। खर्चा बहुत ज्यदा बढ़ जाता है। घर में आर्थिक स्थिती

 खराब होनी शुरू हो जाती है। जो पैसा उघार ले जाता है वह  वापस देने का नाम नहीं लेता। रसोईघर में भारी सामान

 अगर उत्तर दिशा में रखा होगा तो भी घन की रूकावट रहेगी। पैसा आयेगा पर रूक रूक कर आयेगा। आप कमाते 

जाऐगंे पैसा जलता जाऐगा। एक वक्त ऐसा आ जायेगा कि तंग आकर आप अपना मकान बेचने की कोशिश करेगें पर

 मकान की कोई अच्छी कीमत नहीं मिलेगी क्योंकि उत्तर दिशा में रसोईघर होने से जैविक ऐनर्जी की कमी हो जाती है।

 इस लिये रसोईघर को वास्तुशास्त्र के नियमो के अनुसार बनाना चाहिये।

भोजन बनाते समय मुख की दिशानुसार प्रभाव

1. उत्तर- उत्तर की तरफ मुख करके खाना बनाना अत्यन्त अशुभ है। इससे घर व बाहर विवाद बढ़ेंगे। घर में खर्चा

 बहुत ज्यदा बढ़ जाता है। घर में आर्थिक स्थिती खराब होनी शुरू हो जाती है। जो पैसा उघार ले जाता है वह  वापस 

देने का नाम नहीं लेता।

2. पूर्व- रसोइया यदि पूर्वाभिमुख होकर भोजन बनाए तो वह प्रसन्नता पूर्वक काम करेगा तथा शास्त्रानुसार भी पूर्व दिशा 

में मुख खाना बनाने के लिए आदर्श माना गया है।

3. दक्षिण- दक्षिण में मुख करके खाना बनाने से निर्धनता आती है। जोड़ र्दद ,सिर में र्दद ,माइग्रेन होने की समस्या 

हमेशा बनी रहेगी।

4. पश्चिम- पश्चिम में मुख करके खाना बनाने वाली स्त्री अपने पतियों की तुलना में अपना सौन्दर्य खो देती हैं और शीघ्र

 ही पतियों से अधिक आयु की दिखाई देने लगती हैं। इस लिये रसोईघर को वास्तुशास्त्र के नियमो के अनुसार बनाना 

चाहिये।

सुनील हिंगल: वास्तु विशेषज्ञ एंव ऐनर्जी स्कैनर

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