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9 - मकान बनाने में अड़चन ही अड़चन कहीं वास्तुदोष तो नहीं ?

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       ऐसा क्यो होता है कि जब हम ने मकान बनाना शुरू किया तो मकान पुरा बनने का नाम ही नहीं लेता। खर्चा बढ़ता जाता है।

 खर्चा भी ऐसा कि हमारी उम्मीद से तीन गुणा ज्यादा खर्च हो कर भी मकान वैसा नहीं बनता जैसा हम ने सोचा था। यानि कुलमिला

 कर तस्सली नहीं होती। मकान बनाते वक्त खर्चा तो बढ़ता ही है और टाईम भी बहुत ज्यादा लगता है। हम ने सोचा था कि छः

 महीने में मकान पूरा हो जायेगा पर कई बार तीन से छः साल तक लग जाते है। कोई कारण तो जरूर है, कि मकान बनाते वक्त कभी

 मिस्त्री भाग जाता है कभी मजदूरो से लड़ाई हो जाती है कभी सामान मिलने में परेशानी आती है। हर चीज़ में अड़चन ही अड़चन।

 फिर इंसान सोचता है कि मेरे साथ ही ऐसा क्यो हो रहा है सारी मुसीबते क्या मेरे पास ही आनी थी। सारी जमा पूंजी खत्म हो गई 

पर मकान में मजा नहीं आया चलो जैसे तेसे मकान तो बन गया। अब मकान में आ गये तो बिमार पड़ने लगे। कोई कारण तो है इन 

सब चीजो के पिछे। कभी अपने भाग्य को कोसते है कभी आपस में लड़ने बैठ जाते है। बात बात में लड़ाई बस मन में तस्सली होती है

 कि अपना मकान है।

पहला कारण है मुहूर्त, दूसरा मकान की शुरूआत और तीसरा कारण है दक्षिण में ढलान का होना। इन्हीं तीनो में से कोई एक कारण

 तो जरूर है जो मकान बनने में देरी या रूकावट पैदा करता है।

 मुर्हूत का मतलब सही मुर्हूत में प्लाट नहीं खरीदना। प्लाट गलत मर्हूत में खरीद भी लिया तो सही मर्हूत में उसे बनाना शुरू नहीं 

किया । खरीद भी लिया औेर बना भी लिया पर सही मर्हूत में गृह प्रवेश नहीं किया।

    प्लाट हमेशा 15 मई से 15 अक्टूबर तक खरीदें औेर इन्हीं महीनो में बनाना भी शुरू कर दे। कोई रूकावट नहीं आऐगी। लेकिन 

4,9,14,30 तारीख को प्लाट खरीदने से बचे। मंगलवार, शनिवार, रविवार को भी न खरीदे। हो सके तो शुक्लपक्ष में ही खरीदे।

    गृह प्रवेश सोमवार - प्रसन्नता और सुख समृद्धि देने वाला, बुधवार - धन प्राप्ति एंव प्रसंन्नतादायक, गुरूवार -दीर्धायु, प्रसन्नता, 

सुसंतानदायक तथा शुक्रवार - मन की शांति, उन्नति और समृद्धि देने वाला होता है। अतः इन्ही वारां में नये तथा शुभ कार्य करने 

चाहिये। इस के विपरीत रविवार, मंगलवार और शनिवार से बचना चाहियें क्योकि इनके अच्छे परिणाम नहीं होते।

     दुसरा कारण है मकान की शुरूआत यानि सब से पहले दक्षिण - पश्चिम से बनाना शुरू करें। फिर दक्षिण - पश्चिम से दक्षिण की 

और बनाये। फिर  दक्षिण से दक्षिण - पूर्व की ओर बनायें यानि दक्षिण - पश्चिम में दीवार पहले बनायें। वास्तु के अनुसार दक्षिण - 

पश्चिम से शुरूआत अगर करेगें तो कोई रूकावट नहीं आयेगी।

   तीसरा औेर अहम कारण है दक्षिण दिशा में ढलान का होना। दक्षिण में कभी भी बढ़ा खडडा, ज्यादा खिड़कियां, हलकापन यानि

दक्षिण दिशा में, उतर और पूर्व  से छोटी दिवार नहीं होनी चाहिये। यह वास्तु में एक बहुत बढ़ा वास्तुदोष हैं।

   आम पढ़ा लिखा व्यक्ति इसे वहम में डालना या ढकोसला मानता है। पर जब उसके साथ वास्तव में यह सब कुछ गुजरता है तो वह

 थकहार कर मान ही लेता है कि इस सृष्टि को चलाने वाला कोई है जिसने यह सब कुछ बनाया। दिन - रात, शुभ - अशुभ ,काल, वार,

सप्ताह, महीने,साल यानि वर्ष, तिथि, योग, मर्हूत यह  कोई आजके तो नहीं बने और न किसी पंडितजी ने घर बैठ कर बनाये है। यह 

तो हमारे जन्म से हजारो, लाखो साल पहले के बने हुये है। हम इसे नहीं मानते क्योकि हमे इसकी जानकारी नहीं है। जिस दिन  

जानकारी ले लेगंे तो मानने लगेगें क्योकि यह एक संाईस है। तभी तो यह विद्या आज पूरा विश्व अपना रहा है। अपनी अज्ञानता के

 कारण ही हम दुखी है।सच यह भी है कि हम हर चीज की जानकारी रख नहीं सकते। इसीलिये हर काम के लिये कोई न कोई 

जानकर्ता अलग - अलग होता है। सलाह लेने में क्या हर्ज है।

  मानव को वास्तुविज्ञान के सिद्धातों की अवहेलना करने के बजाये उन पर अमल कर के अपना जीवन सुखमय बनाना चाहिये। दुख 

की बात तो यह है कि मनुष्य अंहकारवश स्वंय को ही कर्ताधर्ता मान लेता है और प्रकृति के विरूद्व कार्य करता है।

सुनील हिंगल: वास्तु विशेषज्ञ एंव ऐनर्जी स्कैनर

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